Wednesday, 3 August 2011


Rote hue duniya me aye...
Mamta se bhari muskaan ne...
Seene me chupa liya muje...
Maan ki lori,on ne ...
Rona bhula diya muj ko..

Fir waqt badla...

Maan ki ungli pakad ke...
Chalna seekha...
Kuch muskrahato,n se or kuch..
Zid ne har cheez ko pa liya..

Fir waqt badla...

Bachpan se jawani tak..
kuch dost bane kuch bichde..
kisi ke dil me jage bana li..
kisi ko dil me basa liya...

Fir waqt badla...

Dil me khile fool jawani ke..
Murjane lage...
Kisi apne ke kiye hue vade..
Dil pe chot lagane lage....

Saturday, 11 June 2011

आज आंख रोई तो मौत ने
मेरा हाथ थाम लिया ...
कहा निराश क्यूँ है...

अँधेरी काली रातो के बाद..
सूरज को निकलना ही है...

जिंदगी अनसुल्जी पहेली तो नहीं...
जिसे कोई ना सुल्जा सका...

अपने सब रिश्ते सब बंधन ...
निभा के तो आ...

जिन हो ने तुज को रुलाया है...
उन सब को हँसा कर तो आ...

जिंदगी से हार कर नहीं ...
उस कर हरा के तो आ...

फिर हम दोनों साथ चलेंगे...
उन सब को रोता हुआ छोड़ कर.....!!!!!!!
वोह तड़पता हुआ...
आज रात मुझे मिला ...
उस के होंठो पे मुस्कान तो थी...
पर दर्द भरी....
उस ने धीरे से...
मेरे कान में सरगोशी की...
अलविदा मित्र , मैं जा रहा हूँ ...
एक नए वर्ष को जगे देने के लिए ...
और फिर मेरे जीवन का...
एक और वर्ष...
कल रात मुझ से बिचड गया..
रह गई तो बस उसकी यादें...
यादें जो कभी नहीं छोडती..
जो बस जाती है वजूद में ...!!!!!!!
वक़्त कहीं ठहर सा गया ...
दीवारे खामोश है बरसो से ...
फासले मिटने का...
नाम नहीं लेते ...
अश्कों का सैलाब ना जाने...
कब से बह गया ...
बंद दरीचों के पीछे कहीं ...
सूनी आँखों का ऐतबार ...
बस टूटने को ही है ...
जिस्म का दर्द तो सह लिया ...
पर तेरे ना आने का दर्द ...
मुझे अब जीने ना देगा ...
जिंदगी अब छोड़ दे...
तनहा मुझे ...!!!!!!!
वक़्त कहीं ठहर सा गया ...
दीवारे खामोश है बरसो से ...
फासले मिटने का...
नाम नहीं लेते ...
अश्कों का सैलाब ना जाने...
कब से बह गया ...
बंद दरीचों के पीछे कहीं ...
सूनी आँखों का ऐतबार ...
बस टूटने को ही है ...
जिस्म का दर्द तो सह लिया ...
पर तेरे ना आने का दर्द ...
मुझे अब जीने ना देगा ...
जिंदगी अब छोड़ दे...
तनहा मुझे ...!!!!!!!
आज फिर एक गुनाह...
करने जा रहा हूँ मैं...
जो समजते थे मुर्दा मुझे...
उन को जीने के तरीके...
सिखा रहा हूँ मैं ...
अँधेरी काली रातों में....
दिल में जली लो से...
सूरज की तलाश में...
जा रहा हूं मैं ...
मरघटी ख़ामोशीओं से...
दूर कहीं मंदिर की घंटीओं में...
गुनगुना रहा हूं मैं ...
जुके नहीं जो पत्थर कभी...
उन्हें सजदे सिखा रहा हूँ मैं...
आज फिर जीने जा रहा हूँ मैं...
इक गुनाह करने जा रहा हूँ मैं...
मकसद दिल में हो तो...
मंजिले मिल ही जाती है.....
तमन्ना गर हो ...
अंधेरों से निकलने की...
तो रौशनी दिल से आती है....!!!!!!!

Koi mol nahin ashqon ka is jahaan me....
Jahan lahoo bhi pani ki tara bikta hai....

Thursday, 19 May 2011

'' ज़ख़्म ''


कोन रुकता यहाँ... 
सब चले जाते है..
रूह तक साथ निभाने वाले...
भी फरेब दे जाते है...
मरहम की बाते करके... 
उम्र भर के ज़ख़्म दे जाते है...!!!!!!!

Saturday, 14 May 2011

'' बेवफाई ''

तेरी बेवफाई को... 
क्या नया नाम दे ....
लोग यूँही पथरों को ,..
बदनाम किया करते है.....!!!!!!!

Thursday, 12 May 2011

'' गुनाह ''


यह कानो में  सरगोशियाँ ...
झुकी पलकों की मदहोशियाँ ...
उठते नहीं क़दम मेरे...
खुदा माफ़ करे ...
आज फिर गुनाह होगा .....!!!!!!!

'' लो तेरे प्यार की ''


हर एक क़दम पर नई...
मुश्किलों का सामना...
जिंदगी करती गई...
जिन्दगी युही चलती रही...
रात की चादर ओड कर ...
जब चला गया सूरज ...
लो तेरे प्यार की तब भी जलती रही ...
ज़ख़्म तो भर गए वक़्त के साथ...
टीस तुज से बिछडने की बढती  गई ...
धुप में जला हुआ मुक़दर देख कर ...
छाव भी पास आने से डरती रही...
इस खंडर हुए दिल में ...
रीझ तुज से मिलने की बदती गई...
जिन्दगी युही चलती रही.....!!!!!!!


'' ये आज भी जिंदा है ''

आज नहीं तो कल...
दम तोड़ ही जायेगी..
ये सोच दिल को समजा रखा था ..
दूर किसी कोने में दिल के... 
उस को दबा  रखा था ...
पर हर बार वोह...
मेरे सामने  आ जाती है ...
जब भी आइना देखता हूँ ...
खुद की जगे उस को पाता  हूं...
पलकें बंद होते  ही  ...
वोह आ जाती है  ...
तनहाइयाँ इस को अच्छी लगती है... 
इनका मैं क्या करून ...
ये आज भी  जिंदा है...
'' यादें ''
किसी अपने की.....!!!!!!!

Wednesday, 11 May 2011

'' शरारत ''

उनकी हर शरारत में... 
जाने क्या सकून मिलता है ..
लब पे देखी नहीं मुस्कराहट ..
के दिल मचलता है ...!!!!!!!

'' अपने ''

मुझे उनसे  गिला नहीं कोई ...
फक्त खुद से शिकायत है ...
मैं उन को क्यूँ अपना समजता हूँ...
जो अपने बन कर भी ...
अपने नहीं रहते...!!!!!!!

'' मुस्कान ''

रोज़ घर से निकलता हूँ..... 
एक नए शिखर को छुने के लिए.....
कभी पाँव थक जाते है..... 

कभी लबों पे मुस्कान होती है .....!!!!!!!

'' मेरे अपनों के ''

अपनों के दिए दर्द आज भी
गेरों के मरहम से
अभी भी अछे लगते है..
डर लगता है
कहीं फिर वोह मरहम
एक नया दर्द ना बन जाये...
मुझे ये दर्द अच्छे लगते है
ये मेरे है
मेरे अपनों के दिए हुए ...!!!

'' तजुर्बा ''

एक तजुर्बा बुहत था...
जो सब कुछ सिखा गया ...
एक कारवां गुजरा था मुहब्बत का मेरे दिले बागबान पर..
जाते हुए बंज़र मेरे शहर को बना गया ....!!!

'' खफा ''

शिकवे , शिकायतें, रंजिशे ...
थी नहीं उस से कोई ....
फिर भी ना जाने क्यूँ ..
मैं उस से खफा सा था ....!!!!!!!

'' किसी की बात ''

मत छेड़ किस्सा मेरी उल्फतों का.....
बड़ी लम्बी कहानी है .....
हम ज़माने से नहीं हारे .....
किसी की बात मानी है ....!!!!!!!

'' सूखे हुए फूल ''

आज देखी एक किताब ...
तो तुम याद आ गए ...
मुड़े हुए कुछ पन्ने...
तेरी याद दिला गए ...
छुपा कर रखा थे ...
जो फूल कभी गुलाब के ...
सूखे हुए वोह फूल
तेरी याद दिला गए ....!!!!!!!

'' इंतज़ार ''

वक्त की शाख से तोड़ कर...
रखे थे कुछ लम्हे
तुम भी कुछ उलझे रहे.....
हम भी कुछ मसरूफ से थे....
अब तो आ जाओ ...
के बहार फिर आने को है .....!!!!!!!

'' याद ''

आँखों ने जो देखा हुसन का कमाल आँखों में ...
तमाम उम्र बस गई किसी की  आँखों में ...!!!!!!!

'' सदा ''

वोह आते तो है मेरी मजार पर चुप चाप से ...
उनकी ये खामोशियाँ मुझे फिर जीने की सदा देती है .....!!!!!!!

'' मंज़िल ''

बस मंजिल की तरफ दो कदम बढा़...
खुद को ढारस आप बँधा...
नाकाम हुए तो क्या शर्म यहाँ...
किसी का हाथ पकड़...
किसी की तरफ हाथ बढा़...
स्वर्ग यही है नरक यही है...
बस ना मात्र का फर्क यहाँ..
जो चमक गया वोह सितारा है..
जो फिसल गया तो शर्म है क्या...
खुद को ढारस आप बँधा...
एक हाथ पकड़ एक हाथ बढा़...
जीवन के पथ पर ...
मंज़िल की तरफ बढता चला जा .....!!!!!!!

'' तलाश ''

टुकड़ों टुकड़ों में जिस्म था बिका....
टुकड़ों में कट गई रात...
सहर कब तलक रुठेगी मुझसे...
मुझे आज भी है जिंदगी की तलाश.....!!!!!!!

'' इन्सान ''

कोई मुझ को काफिर कहे ...
कोई कह दे झल्ला ...
मंदिर के अंदर बैठ कर ...
गुरमुखी में नाम लिख दिया अल्ल्हा.....!!!!!!!

 ( झल्ला )     का मतलब पागल , 

 (  गुरमुखी  ) का मतलब सिखों की भाषा .

'' तमन्ना ''

रात की चादर ओड़ कर ...
चाँद की यादों को छोड़ कर ...
फिर एक नए सूरज को ...
पाने की तमन्ना लिए अभी चलते है यारों .....!!!!!!!

'' दर्द ''

अब के डूबेंगे मेरे शहर के लोग...
मैंने इंसानों की भीड़ में.....
पथरों को रोते देखा है .....!!!!!!!

'' सादगी ''

मेरी सादगी पे मत जाना...
हम भी ज़माने  का चलन रखते है ....
पल में ना सही...
रंग तो हम भी बदलते है ...!!!!!!!

'' दो क़दम ''

लिखने वाले तो और है...
ज़माने में बहुत...
हम तो कलम को पकड़ कर ...
दो कदम चलना सीख रहे है....!!!!!!!