Saturday, 11 June 2011

आज आंख रोई तो मौत ने
मेरा हाथ थाम लिया ...
कहा निराश क्यूँ है...

अँधेरी काली रातो के बाद..
सूरज को निकलना ही है...

जिंदगी अनसुल्जी पहेली तो नहीं...
जिसे कोई ना सुल्जा सका...

अपने सब रिश्ते सब बंधन ...
निभा के तो आ...

जिन हो ने तुज को रुलाया है...
उन सब को हँसा कर तो आ...

जिंदगी से हार कर नहीं ...
उस कर हरा के तो आ...

फिर हम दोनों साथ चलेंगे...
उन सब को रोता हुआ छोड़ कर.....!!!!!!!
वोह तड़पता हुआ...
आज रात मुझे मिला ...
उस के होंठो पे मुस्कान तो थी...
पर दर्द भरी....
उस ने धीरे से...
मेरे कान में सरगोशी की...
अलविदा मित्र , मैं जा रहा हूँ ...
एक नए वर्ष को जगे देने के लिए ...
और फिर मेरे जीवन का...
एक और वर्ष...
कल रात मुझ से बिचड गया..
रह गई तो बस उसकी यादें...
यादें जो कभी नहीं छोडती..
जो बस जाती है वजूद में ...!!!!!!!
वक़्त कहीं ठहर सा गया ...
दीवारे खामोश है बरसो से ...
फासले मिटने का...
नाम नहीं लेते ...
अश्कों का सैलाब ना जाने...
कब से बह गया ...
बंद दरीचों के पीछे कहीं ...
सूनी आँखों का ऐतबार ...
बस टूटने को ही है ...
जिस्म का दर्द तो सह लिया ...
पर तेरे ना आने का दर्द ...
मुझे अब जीने ना देगा ...
जिंदगी अब छोड़ दे...
तनहा मुझे ...!!!!!!!
वक़्त कहीं ठहर सा गया ...
दीवारे खामोश है बरसो से ...
फासले मिटने का...
नाम नहीं लेते ...
अश्कों का सैलाब ना जाने...
कब से बह गया ...
बंद दरीचों के पीछे कहीं ...
सूनी आँखों का ऐतबार ...
बस टूटने को ही है ...
जिस्म का दर्द तो सह लिया ...
पर तेरे ना आने का दर्द ...
मुझे अब जीने ना देगा ...
जिंदगी अब छोड़ दे...
तनहा मुझे ...!!!!!!!
आज फिर एक गुनाह...
करने जा रहा हूँ मैं...
जो समजते थे मुर्दा मुझे...
उन को जीने के तरीके...
सिखा रहा हूँ मैं ...
अँधेरी काली रातों में....
दिल में जली लो से...
सूरज की तलाश में...
जा रहा हूं मैं ...
मरघटी ख़ामोशीओं से...
दूर कहीं मंदिर की घंटीओं में...
गुनगुना रहा हूं मैं ...
जुके नहीं जो पत्थर कभी...
उन्हें सजदे सिखा रहा हूँ मैं...
आज फिर जीने जा रहा हूँ मैं...
इक गुनाह करने जा रहा हूँ मैं...
मकसद दिल में हो तो...
मंजिले मिल ही जाती है.....
तमन्ना गर हो ...
अंधेरों से निकलने की...
तो रौशनी दिल से आती है....!!!!!!!

Koi mol nahin ashqon ka is jahaan me....
Jahan lahoo bhi pani ki tara bikta hai....