Saturday, 11 June 2011

वक़्त कहीं ठहर सा गया ...
दीवारे खामोश है बरसो से ...
फासले मिटने का...
नाम नहीं लेते ...
अश्कों का सैलाब ना जाने...
कब से बह गया ...
बंद दरीचों के पीछे कहीं ...
सूनी आँखों का ऐतबार ...
बस टूटने को ही है ...
जिस्म का दर्द तो सह लिया ...
पर तेरे ना आने का दर्द ...
मुझे अब जीने ना देगा ...
जिंदगी अब छोड़ दे...
तनहा मुझे ...!!!!!!!

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