Saturday, 11 June 2011

आज फिर एक गुनाह...
करने जा रहा हूँ मैं...
जो समजते थे मुर्दा मुझे...
उन को जीने के तरीके...
सिखा रहा हूँ मैं ...
अँधेरी काली रातों में....
दिल में जली लो से...
सूरज की तलाश में...
जा रहा हूं मैं ...
मरघटी ख़ामोशीओं से...
दूर कहीं मंदिर की घंटीओं में...
गुनगुना रहा हूं मैं ...
जुके नहीं जो पत्थर कभी...
उन्हें सजदे सिखा रहा हूँ मैं...
आज फिर जीने जा रहा हूँ मैं...
इक गुनाह करने जा रहा हूँ मैं...

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